॥ महाकालभैरवाष्टकम् अथवा तीक्ष्णदंष्ट्रकालभैरवाष्टकम् ॥

शिव

॥ ॐ ॥ यं यं यं यक्षरूपं दशदिशिविदितं भूमिकम्पायमानंसं सं सं संहारमूर्तिं शिरमुकुटजटाशेखरं चन्द्रबिम्बम्।दं दं दं दीर्घकायं विकृतनखमुखं चोर्ध्वरोमं करालंपं पं पं पापनाशं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम्॥१॥ रं रं रं रक्तवर्णं कटिकटिततनुं तीक्ष्णदंष्ट्राकरालंघं घं घं घोषघोषं घघघघघटितं घर्झरं घोरनादम्।कं कं कं कालपाशं द्रुक्-द्रुक् दृढितं ज्वालितं कामदाहंतं तं तं दिव्यदेहं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम्॥२॥ लं लं […]

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निर्वाण षटकम्

शिव

॥ ॐ ॥ मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम् न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे न च व्योम भूमिर् न तेजॊ न वायु: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥ न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: न वा सप्तधातुर् न वा पञ्चकोश: न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥ न मे द्वेष रागौ न मे

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श्रीरुद्राष्टकं

शिव

॥ ॐ ॥ नमामीशमीशाननिर्वाणरूपंविभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहंचिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्॥१॥ निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयंगिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम्।करालं महाकालकालं कृपालंगुणागारसंसारपारं नतोऽहम्॥२॥ तुषाराद्रिसङ्काशगौरं गभीरंमनोभूतकोटिप्रभाश्रीशरीरम्।स्फुरन्मौलिकल्लोलिनीचारुगङ्गालसद्भालबालेन्दुकण्ठे भुजङ्गा॥३॥ चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालंप्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्।मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालंप्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि॥४॥ प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशम्अखण्डमजं भानुकोटिप्रकाशम्।त्रयःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिंभजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम्॥५॥ कलातीतकल्याणकल्पान्तकारीसदा सज्जनानन्ददाता पुरारि।चिदानन्दसन्दोहमोहापहारीप्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारि॥६॥ न यावदुमानाथपादारविन्दंभजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।न तावत्सुखं शान्तिसन्तापनाशंप्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम्॥७॥ न जानामि योगं

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श्रीशिवताण्डवस्तोत्रम्

शिव

॥ ॐ ॥  जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थलेगलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयंचकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥१॥ जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावकेकिशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥२॥ धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदिक्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥३॥ जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा-कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरेमनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥४॥ सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः।भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकःश्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥५॥ ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरंमहाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तु नः॥६॥ करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके।धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥७॥ नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्-कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः।निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरःकलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः॥८॥ प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्।स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदंगजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥९॥ अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी-रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्।स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकंगजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥१०॥ जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वसद्-विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्।धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल-ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥११॥ दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्-गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः

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लिंगाष्टकं 

शिव

॥ ॐ ॥ ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गंनिर्मलभासितशोभितलिङ्गम्।जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गंतत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥१॥ देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गंकामदहनकरुणाकरलिङ्गम्।रावणदर्पविनाशनलिङ्गंतत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥२॥ सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गंबुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम्।सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गंतत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥३॥ कनकमहामणिभूषितलिङ्गंफणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गम्।दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गंतत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥४॥ कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गंपङ्कजहारसुशोभितलिङ्गम्।सञ्चितपापविनाशनलिङ्गंतत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥५॥ देवगणार्चितसेवितलिङ्गंभावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम्।दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गंतत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥६॥ अष्टदलोपरिवेष्टितलिङ्गंसर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम्।अष्टदरिद्रविनाशनलिङ्गंतत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥७॥ सुरगुरुसुरवरपूजितलिङ्गंसुरवनपुष्पसदार्चितलिङ्गम्।परात्परं परमात्मकलिङ्गंतत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥८॥ फलश्रुतिः लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यंयः पठेच्छिवसन्निधौ।शिवलोकमवाप्नोतिशिवेन सह मोदते॥

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काल भैरव अष्टक

शिव

॥ ॐ ॥ देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम् । नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगंबरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ १॥ भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम् । कालकालमंबुजाक्षमक्षशूलमक्षरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ २॥ शूलटंकपाशदण्डपाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् । भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ३॥ भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम् । विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ ४॥ धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशनं कर्मपाशमोचकं सुशर्मधायकं विभुम् । स्वर्णवर्णशेषपाशशोभितांगमण्डलं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥

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श्रीकाशीविश्वनाथाष्टकम् ॥

शिव

॥ ॐ ॥ गङ्गातरङ्गरमणीयजटाकलापंगौरीनिरन्तरविभूषितवामभागम्।नारायणप्रियमनङ्गमदापहारंवाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥१॥ वाचामगोचरमनेकगुणस्वरूपंवागीशविष्णुसुरसेवितपादपीठम्।वामेन विग्रहवरेण कलत्रवन्तंवाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥२॥ भूताधिपं भुजगभूषणभूषिताङ्गंव्याघ्राजिनाम्बरधरं जटिलं त्रिनेत्रम्।पाशाङ्कुशाभयवरप्रदशूलपाणिंवाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥३॥ शीतांशुशोभितकिरीटविराजमानंभालेक्षणानलविशोषितपञ्चबाणम्।नागाधिपारचितभासुरकर्णपूरंवाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥४॥ पञ्चाननं दुरितमत्तमतङ्गजानांनागान्तकं दनुजपुङ्गवपन्नगानाम्।दावानलं मरणशोकजराटवीनांवाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥५॥ तेजोमयं सगुणनिर्गुणमद्वितीयंआनन्दकन्दमपराजितमप्रमेयम्।नागात्मकं सकलनिष्कलमात्मरूपंवाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥६॥ रागादिदोषरहितं स्वजनानुरागंवैराग्यशान्तिनिलयं गिरिजासहायम्।माधुर्यधैर्यसुभगं गरलाभिरामंवाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥७॥ आशां विहाय परिहृत्य परस्य निन्दांपापे रतिं च सुविनिवार्य मनः समाधौ।आदाय हृत्कमलमध्यगतं परेशंवाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥८॥ फलश्रुतिः वाराणसीपुरपतेः स्तवनं शिवस्यव्याख्यातमष्टकमिदं

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॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

शिव

॥ ॐ ॥ नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनायभस्माङ्गरागाय महेश्वराय।नित्याय शुद्धाय दिगम्बरायतस्मै नकाराय नमः शिवाय॥१॥ मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चितायनन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय।मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजितायतस्मै मकाराय नमः शिवाय॥२॥ शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द-सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजायतस्मै शिकाराय नमः शिवाय॥३॥ वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य-मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनायतस्मै वकाराय नमः शिवाय॥४॥ यक्षस्वरूपाय जटाधरायपिनाकहस्ताय सनातनाय।दिव्याय देवाय दिगम्बरायतस्मै यकाराय नमः शिवाय॥५॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ।शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥ ॥ इति श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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घोरकष्टोद्धरण

गुरुदेव

॥ ॐ ॥   श्रीपादश्रीवल्लभ त्वं सदैव ।श्रीदत्तास्मान् पाहि देवाधिदेव ।भावग्राह्य क्लेशहारिन् सुकीर्ते ।घोरात्कष्टादुद्धरास्मान्नमस्ते ॥१॥ त्वं नो माता त्वं पिताऽप्तोऽधिपस्त्वं ।त्राता योगक्षेमकृत् सद्गुरुस्त्वम् ।त्वं सर्वस्वं नो प्रभो विश्वमूर्ते ।घोरात्कष्टादुद्धरास्मान्नमस्ते ॥२॥ पापं तापं व्याधिमाधिं च दैन्यं ।भीतिं क्लेशं त्वं हराशु त्वदन्यम् ।त्रातारं नो वीक्ष ईशास्त्रमूर्ते ।घोरात्कष्टादुद्धरास्मान्नमस्ते ॥३॥ नान्यस्त्राता नापि दाता न भर्ता ।त्वत्तो देव त्वं शरण्योऽखिलहर्ता

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तोटकाष्टकम्

गुरुदेव

॥ ॐ ॥ विदिताखिल शास्त्र सुधा जलधे महितोपनिषत्-कथितार्थ निधे । हृदये कलये विमलं चरणं भव शङ्कर देशिक मे शरणम् ॥ 1 ॥ करुणा वरुणालय पालय मां भवसागर दुःख विदून हृदम् । रचयाखिल दर्शन तत्त्वविदं भव शङ्कर देशिक मे शरणम् ॥ 2 ॥ भवता जनता सुहिता भविता निजबोध विचारण चारुमते । कलयेश्वर जीव विवेक विदं भव

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